Wednesday, December 15, 2010

|| " वाह, उस्ताद वाह " ||

Poem: © Sarath Vyas, Dec 15th, 2010
Photo: River Bhawani, Silent Valley National Park, © Sarath Vyas

Tuesday, October 26, 2010

आज सूरज को आँगन में छुपा दो


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आज सूरज को आँगन में छुपा दो
और घर जब रौशनी से भर जाए
तो उलीच देना कतरा -कतरा
बिखरे तो बिखरे, बहे सो बहे !
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कटोरे भर रौशनी मुनिया को
और संदूक भर खुल्ली काका को
बाकी जो बचे वो जुम्मन को
इनकी बस्ती में सूरज आया ही कब?
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जब गुनगुना हो जाए सूरज
तो काजल में पार लेना
बच्चों को चुपके से बुलाकर
उनके आँखों में ढाल देना
इनकी आँखों में सूरज फबता है !
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रात स्याह -सर्द हो जाय तो
कम्बल उढ़ा के विदा कर देना
लालटेन से रास्ता भी बता देना
कहना, घर पहुँच के मिस कॉल करे
सुबह टाइम पर आये, चुपके से आँगन में छुप जाए

Oct 26, 2010

Sunday, April 4, 2010

कारवाँ -ए- ग़ज़ल

ग़ज़ल का भी अपना एक इतिहास है ! कारवां-ए-ग़ज़ल की तफ्तीश की जाए तो मालूम पड़ता है कि ग़ज़ल का इतिहास हज़ार बरस से भी पुराना है ! दसवीं सदी में ईरान से इसकी शुरुआत हुयी थी ! पहले इसने 'क़सीदे' का रूप गढ़ा फिर 'तशबीब' हुयी ! तशबिबों ने शक्ल बदली और बारहवी सदी में मुगलिया सल्तनत के दरवाजों में 'ग़ज़ल' बन के दस्तक दी ! मुगलिया बादशाहों ने पनाह दी , इसे सजाया और सँवारा भी ! आलम ये हुआ रजवाड़ों के दरखशों से छनती-छनती ये धीरे -धीरे सारे गलियारों में छा गयी ! नाम जुड़ते चले गए ! खुसरो, ग़ालिब, मीर ,ज़फर, मोमिन , जौक, जिगर, दाग, फ़िराक, मजाज़, फ़राज़, फैज़ , फाकिर ऐसे ही तमाम शायर हैं जिनसे उर्दू ग़ज़ल की पहचान बनी ! लेकिन इस बुलंद इमारत की बाकी और भी सुनहरी ईंटे हैं जो गुमनाम रही लेकिन ग़ज़ल को मज़बूत बनाती रही हैं !
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इंशाल्लाह खान 'इंशा' (१७५७ -१८१७)
इंशाल्लाह खान साहब ने 'रानी केतकी की कहानी' लिखी थी , इनकी इस रचना का हिंदी खड़ी-बोली के विकास में अप्रतिम योगदान है ! इंशा के ग़ज़ल कहने की बात अलग ही थी , उर्दू और हिंदी के अल्फाजों को बड़ी ही खूबसूरती से जोड़ने के लिए जाने जाते हैं इंशा !इंशा के समकालीन शायरों में नजीर अकबराबादी, मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा , मीर तकी मीर , शेख कलंदर बख्श जुर’अत, ग़ुलाम हमदानी मुशाफी है !!

आइये पहले इंशा के कलामो पर नज़र डालते हैं !!

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कमर बांधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं
बहुत आगे गए, बाकी जो हैं, तैयार बैठे हैं !
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न छेड़ ऐ नकहते-बादे- बहारी, राह लग अपनी
तुझे अठखेलियाँ सूझे हैं, हम बेज़ार बैठे हैं !!
(नकहते-बादे- बहारी = बसंत की सुगन्धित हवा, विरक्त )
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तसव्वुर अर्श पर है और सर है पा-ए-साकी पर
ग़रज़ कुछ और धुन में इस घडी मयख्वार बैठे हैं !
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ये अपनी चाल है उफ्तादगी से अब की पहरों तक
नज़र आया जहां पर साया -ए-दीवार बैठे हैं
(उफ्तादगी = विपत्तियाँ )
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नजीबों का अजब कुछ हाल है इस दौर में यारो
जहां पूछो यही कहते हैं हम बेकार बैठे हैं
(नजीबों = कुलीन )
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भला गर्दिश फलक की चैन देती है किसे इंशा
ग़नीमत है कि हम-सूरत यहाँ दो चार बैठे हैं !!
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नजीर अकबराबादी , १७३५ - १८३०
आम आदमी की बात को ग़ज़ल की शक्ल में पेश करने के लियी जाने जाते हैं नजीर साहब ! वली मुहम्मद के नाम से पैदा हुए थे ! कहा और लिखा बहुत लेकिन वक़्त में थपेड़ों में बहुत कुछ खो गया !
http://en.wikipedia.org/wiki/Nazeer_Akbarabadi
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दूर से आये थे साक़ी सुन के मयखाने को हम
बस तरसते की चले अफ़सोस पैमाने को हम !
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मय भी है मीना भी है सागर भी है साक़ी नहीं
दिल में आता है लगादे आग मयखाने को हम !

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हम को फंसना था क़फ़स में क्या गिला सय्याद का
बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम!
(क़फ़स = बंधन / पिंजड़ा , सय्याद =शिकारी )
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बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल
अब कहाँ ले जा के बैठे ऐसे दीवाने को हम !
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क्या हुई तकसीर हमसे तू बता दे ए नजीर
ताके शादी-मर्ग समझे ऐसे मर जाने को हम !!
(तकसीर= कसूर , शादी-मर्ग = खुशी से मर जाना )
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मुहम्मद रफ़ी 'सौदा' , १७१३-१७८१
दिल्ली में पैदा हुए मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी 'सौदा' ! शायरी में अपने वक़्त के सबसे बेहतरीन शायर माने जाते हैं 'सौदा' साहब ! उनकी ग़ज़ले उर्दू जुबान की जान समझी जाती है और 'सौदा' साहब दिल्ली की जान समझे जाते हैं ! ग़ज़ल को बादशाही ऐशगाहों से आम आदमी की ज़बान तक ले जाने में 'सौदा' साहब बेमिशाल है ...पागलपन और दीवानगी कि हद तक मासूक कि मोहब्बत को ग़ज़ल के ज़रिये बयान करते थे सौदा साहब ! इनकी इक ऐसी ही ग़ज़ल यहाँ पेश है ... मुलाहिजा फरमाए !!
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दिल ! मत टपक नज़र से कि पाया न जाएगा
जूँ अश्क फिर ज़मीन से उठाया न जाएगा !!
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रुखसत है बागबान कि टुक इक देख ले चमन
जाते हैं वाँ जहां फिर से आया न जाएगा !!
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तेग़े - जफा -ए- यार से दिल सर न फेरियो
फिर मुह वफ़ा को हमसे दिखाया न जाएगा !
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ज़ालिम ! मै कह रहा हूँ कि तू इस खूँ से दर-गुज़र
'सौदा' का क़त्ल है ये छुपाया न जाएगा !!
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दामाने-दाग़े-तेग़ , जो धोया तो क्या हुआ
आलम के दिल से दाग़ मिटाया न जाएगा !
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Meanings
जूँ = ज्यों , टुक = ज़रा, तनिक, आलम = दुनिया

Thursday, November 12, 2009

मैने जीना अब सीखा है॥



मैने पीना कब सीखा था?
मैने जीना कब सीखा था?
एक बोतल जो टूट गयी,
तो महफ़िल सारी रूठ गयी॥

ये दुनिया एक महफ़िल है
और हम इसके मेहमाँ हैं,
हैं कुछ साक़ी
और कुछ आशिक़
उम्मीदें हैं ,कुछ अरमाँ हैं॥

आज अगर कुछ शब्द बहे,
तो आखिर दिल से कौन कहे,
प्यार वफ़ा कसमें और वादे
अब इनकी पीड़ा कौन सहे?

पीड़ा को इतिहास बता कर
पीना मैने अब सीखा है।
शायद लोग और कुछ कह दें
पर जीना मैने अब सीखा है॥

मेरा गाँव !!

मेरी यादों में , जेहन में , रचा -बसा है मेरा गाँव,
चंद्रावल पर, पीपल पीछे , सीधे रस्ते मेरा गाँव !!

गंगा बाबा , तिजिया दाई, खुल्ली काका , दीनदयाल
बाम्हन,ठाकुर, अहीर,गड़रिया, एक बराबर मेरा गाँव !!

आठ बरस परदेस रहे फिर वापस आये मुन्नीलाल,
दिल्ली, सूरत, नाशिक, बम्बई, सपने देखे मेरा गाँव !!

उजले मन और भोलेपन को क्या धोएगी गंगा मइय्या,
बिना टिकट के, महाकुम्भ को, निकल पड़ा है मेरा गाँव !!

ढोल-मँजीरा-कजरी बाजे, आल्हा गायें दे - दे ताल,
चौमासे में, चौपालों पर, इंडियन आइडल, मेरा गाँव !!

मॉनसून, ग्लोबल वार्मिंग, सोलर -सिस्टम ,सब विज्ञान,
पंडित जी, जो यज्ञ करें, तो, पानी पाए ,मेरा गाँव !!
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© सारथ व्यास , १६-११-२००८

नींद मे क्या मुफ़लिसी, सारे सपने हैं भले

नींद मे क्या मुफ़लिसी, सारे सपने हैं भले
गर्दिश-ए-हालात मे ये पेट अब कैसे पले॥
Neend me kya muflisi, saare sapne haiN bhale
gardish-e-haalaat me ye pet aba kaise pale ..

घर, दुकाने, गाड़ियाँ देख लीं इस शहर में
अहम मुद्दा है चूल्हा आज फ़िर कैसे जले ॥
Ghar, dukaane, gaadiyaaN dekh li is shahar me
aham muddaa hai choolha aaj fir kaise jale ...

घाव पोंछे, वक़्त ने मरहम लगाया बेवज़ह
रोटियाँ माँगी तो किस्मत की दुहाई दे चले॥
ghaav poNchhe waqt ne maraham lagaaya bewazah
rotiyaaN maaNgi to kismat ki duhaaee de chale ..

लुटती रही दुकानें , वीराँ हुए बाज़ार सब
बेचने किस वक़्त मे हम ज़मीर अपना चले॥
lutatee rahee dukaane, veeraaN huye baazaar sab
bechane kis waqt me hum zameer apanaa chale ...

ज़िंदगी की दौड़ मे कब लड़खड़ाये कब गिरे,
याद इतना है कि उठकर धूल पोंछी फ़िर चले ॥
ZiNdgee ke daud me kab ladakhadaaye, kaba gire
yaad itna hai ki uthakar dhool pooMchhi fir chale ..

© सारथ व्यास [31st January, 2005]
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