Thursday, November 12, 2009

मैने जीना अब सीखा है॥



मैने पीना कब सीखा था?
मैने जीना कब सीखा था?
एक बोतल जो टूट गयी,
तो महफ़िल सारी रूठ गयी॥

ये दुनिया एक महफ़िल है
और हम इसके मेहमाँ हैं,
हैं कुछ साक़ी
और कुछ आशिक़
उम्मीदें हैं ,कुछ अरमाँ हैं॥

आज अगर कुछ शब्द बहे,
तो आखिर दिल से कौन कहे,
प्यार वफ़ा कसमें और वादे
अब इनकी पीड़ा कौन सहे?

पीड़ा को इतिहास बता कर
पीना मैने अब सीखा है।
शायद लोग और कुछ कह दें
पर जीना मैने अब सीखा है॥

मेरा गाँव !!

मेरी यादों में , जेहन में , रचा -बसा है मेरा गाँव,
चंद्रावल पर, पीपल पीछे , सीधे रस्ते मेरा गाँव !!

गंगा बाबा , तिजिया दाई, खुल्ली काका , दीनदयाल
बाम्हन,ठाकुर, अहीर,गड़रिया, एक बराबर मेरा गाँव !!

आठ बरस परदेस रहे फिर वापस आये मुन्नीलाल,
दिल्ली, सूरत, नाशिक, बम्बई, सपने देखे मेरा गाँव !!

उजले मन और भोलेपन को क्या धोएगी गंगा मइय्या,
बिना टिकट के, महाकुम्भ को, निकल पड़ा है मेरा गाँव !!

ढोल-मँजीरा-कजरी बाजे, आल्हा गायें दे - दे ताल,
चौमासे में, चौपालों पर, इंडियन आइडल, मेरा गाँव !!

मॉनसून, ग्लोबल वार्मिंग, सोलर -सिस्टम ,सब विज्ञान,
पंडित जी, जो यज्ञ करें, तो, पानी पाए ,मेरा गाँव !!
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© सारथ व्यास , १६-११-२००८

नींद मे क्या मुफ़लिसी, सारे सपने हैं भले

नींद मे क्या मुफ़लिसी, सारे सपने हैं भले
गर्दिश-ए-हालात मे ये पेट अब कैसे पले॥
Neend me kya muflisi, saare sapne haiN bhale
gardish-e-haalaat me ye pet aba kaise pale ..

घर, दुकाने, गाड़ियाँ देख लीं इस शहर में
अहम मुद्दा है चूल्हा आज फ़िर कैसे जले ॥
Ghar, dukaane, gaadiyaaN dekh li is shahar me
aham muddaa hai choolha aaj fir kaise jale ...

घाव पोंछे, वक़्त ने मरहम लगाया बेवज़ह
रोटियाँ माँगी तो किस्मत की दुहाई दे चले॥
ghaav poNchhe waqt ne maraham lagaaya bewazah
rotiyaaN maaNgi to kismat ki duhaaee de chale ..

लुटती रही दुकानें , वीराँ हुए बाज़ार सब
बेचने किस वक़्त मे हम ज़मीर अपना चले॥
lutatee rahee dukaane, veeraaN huye baazaar sab
bechane kis waqt me hum zameer apanaa chale ...

ज़िंदगी की दौड़ मे कब लड़खड़ाये कब गिरे,
याद इतना है कि उठकर धूल पोंछी फ़िर चले ॥
ZiNdgee ke daud me kab ladakhadaaye, kaba gire
yaad itna hai ki uthakar dhool pooMchhi fir chale ..

© सारथ व्यास [31st January, 2005]
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Monday, November 9, 2009

दिखला देते गर टूटा दिल .. .


दूर सही पर मिलने हमसे ... ख्वाबों मे तो आ जाते
हम भी दिल का पागलपन, ये दर्द, ज़ुबाँ पर ले आते ॥
door sahee par milne... hamse khwaabo.n me to aa jaate
ham bhee dil ka paagalpan ye dard zubaa.n par le aate

कश्ती ये मेरे ही बोझ से ... मँझधार मे डूब न जाए
पार खड़े वो करे शिकायत ... उनको भी संग ले जाते ॥
kashtee ye mere hee bojh se ma.njhdhaar me doob na jaae
paar khade vo kare shikaayat ... unko bhee sang le jaate

अक्स किसी का तन्हाई मे क्यों रोता है, अब समझा
हमसे बेहतर उन्हे पता है ,क्या होते हैं रिश्ते-नाते ॥
aks kisee ka tanhaaee me kyo.n rotaa hai ab samajhaa
hamse behtar unhe pataa hai kya hote hai.n rishte-naate

क्या होता ,गर अल्फ़ाज़ों को ना छूता, ये दिल का गम
कोरे कागज़ मे गज़लें, या खुद को, महज़ अधूरा पाते ॥
kya hota gar alfaazo.n ko na chhoota ye dil ka gam
kore kaagaz me gazale.n ya khud ko mahaz adhoora paate


अच्छा था जो सबकी ज़िद को हम भी हँस कर टाल गये
दिखला देते गर टूटा दिल तो टूटे दिल को क्या समझाते ॥
achchha tha jo sabkee zid ko ham bhee ha.ns kar taal gaye
dikhala dete gar toota dil to toote dil ko kya samjhaate
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© सारथ व्यास ॥20 अप्रैल 2003॥
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मै लिख पाता हूं कविता जब .. ....

मै लिख पाता हूं कविता जब तुम मन को उकसाते हो ॥

दूर कहीं जब पथ पर अपने,
संघर्ष स्वरों मै मै गाता हूं
तब मेरी बोझिल आँखो को तुम लक्ष्य नया दिखलाते हो॥

शिथिल हो गया जब मन का कवि,
और मैने कविता को मृत माना
तब मरे हुए शब्दों को तुम ही अमृतपान कराते हो ॥

अपनी ही कवितायें गिनकर
ठान ही लूं मै इतिश्री करना
तब मेरे संग्रह की माला मे एक नयी मणि तुम लाते हो॥

जब धरती के सब रंग उजड़ गये
प्रकृति जर हुई विकृत होकर
तब मेरे सपनों की दुनिया मे कई रंग तुम भर जाते हो ॥
मै लिख पाता हूं कविता जब तुम मन को उकसाते हो ॥
-- -- .॥
© सारथ व्यास॥11/03/2002॥

Thursday, July 23, 2009

इश्क़ -विश्क , प्यार - व्यार !!


उर्दू जबाँ का इक अल्फाज़ ही है ' इश्क ' ! किसी ने इसे शोहरत और इज्ज़त से नवाजा तो किसी ने तमाम अल्फाजों में, तमाम मायूसी के साथ इसके 'साइड - इफेक्ट' गिना दिए ! गोया, हद तब हो गयी जब यही अल्फाज़ तमाम शायरों का पसंदीदा मसला बन गया , नौजवानों के लिए क्रेज़ बन गया और उनके माँ- बाप के लिए बवाल-ए-जान ! जान लेने - देने की नौबतें आने लगी ! हिसाब- किताब होने लगा ! दस्तावेज तैयार होने लगे !
पहले नाम आया कैश - लैला का तो पीछे पीछे हीर - राझा , सोनी - महिवाल कितने ही लोग आ गए ! फिर और कहानियां बनीं , कही और सुनी भी गयीं ! इश्क़ 'ट्रेंड' बन गया ! मजनू घर घर पैदा होने लगे ! वक़्त ने थोडी सी अंगडाई ली और फिर 'सक्सेस -रेट' का ग्राफ तेज़ी से गिरने लगा! और नाकामियों के हर्फों से मोहब्बत की इबारत लिखी जानी लगी ! और देखते ही देखते 'देवदास' नाम की इक नयी ज़मात पैदा हो गयी हँसते -खेलते इंसानों में !

साला ! ये इश्क़ का 'लोचा ' क्या है??

ग़ालिब ने ये सवाल शायद पर्सनली ने लिया , तपाक से बोले , " कहते हैं जिसे इश्क़ खलल है दिमाग का ' !
बस ! सारे अलसाये - सकुचाये कलम-बाजों को मसाला मिल गया ! दिल खोल के लिखा...
अब क्या क्या लिखा उसे उन्ही की इबारत में टुकडों- टुकडों में पढेंगे .. मीर, दाग़, फ़राज़, फैज़, मोमिन, ग़ालिब, फाकिर सब के अंदाज़ -ओ-बयाँ से रू-ब-रू करवाने की कोशिश रहेगी !!
XXX
रोने - धोने में जिन्दगी जिन्हें बर्बाद करनी हो वो इश्क के पास जाए .. 'मीर' ने शायद इश्क का रुपहला रूप देखा ही नहीं था ! मीर की शायरी में 'consistency' दिखाई देती है ! मीर साहब के लिए इश्क का मतलब था दिल की बीमारी ... वो भी इक जानलेवा बीमारी ....

उल्टी हो गयी सब तदबीरें , कुछ न दवा ने काम किया
देखा, इस बीमारी -ए-दिल ने आखिर काम तमाम किया
अहद जवानी रो - रो काटी, पीरी में ली आँखे मूँद,
यानी रात बहुत थे जागे, सुबह हुयी आराम किया !!!


आराम फरमाते 'मीर' का जो कोई हाल लेने पहुँचा तो दर्द की गिरफ्त में कराहते दिल का फरमान सुनाई दिया " सिरहाने मीर के आहिस्ता बोलो, अभी टुक रोते रोते सो गया है !
आप पढेंगे तो मालूम चलेगा की वाकई मीर को इश्क ने बहुत रुलाया है और मजे की बात ये है की मीर इसे बखूबी कुबूल भी करते हैं ... !!! या रोये या रुलाये , अपनी तो यूँ ही गुज़री , ! मीर से जब भी पूछा की इश्क क्या है ज़वाब वही आया :-

क्या कहूं तुम से मैं कि क्या है इश्क,
जान का रोग है, बला है इश्क !


इतनी सारी खामियाँ दिखाने के बावजूद मीर मज़े से पूछते हैं कि
'क्या कहीं तुम ने भी किया है इश्क
XXX
ग़ज़ल को ज़बान देने की बात हो ,रंगीनियत के किस्से हो और 'दाग' साहब का ज़िक्र न हो तो बेमानी होगी ! दाग की रंगीनियत इक पहेली है ! मैंने दाग की जिन्दगी के कुछ पन्ने पढे हैं और उनके कुछ कलाम भी ! मैं सोच के हैरान हो जाता हूँ कि तन्हाई में तड़पता -बिलखता 'दाग़ देहलवी' किस खूबी से खुद को चुप कर लेता है और उसी खूबी से अगले ही पल रंगीन मिजाज़ 'नवाब मिर्जा खान दाग' बन जाता है ! दाग़ का 'इश्क' कभी गिले -शिकवे के गलियारों में घूमा तो कभी मुह-फट आवारा बन गया !

तू है हरजाई तो अपना भी यही तौर सही
तू नहीं और सही , और नहीं , और सही


इश्क आरजू और इबादत बन बैठा दाग़ के लिए ( " ...आरजू है वफ़ा करे कोई !!), जब हकीकत से रू-ब-रू होने की घड़ी आयी तो दाग़ जैसा आदमी भी छटपटा उठा ! ("... क्या मिला हम को जिन्दगी के सिवाय ..वो भी नातमाम , दुश्वार और खराब !! )जिस 'दिमागी खलल' की बात ग़ालिब ने की थी, जिस 'बीमारी-ए-दिल' का ज़िक्र मीर ने किया था वो दाग़ में दिखाई दी ! मीर-ग़ालिब ने जो अल्फाज़ दिए उन्हें दाग़ ने जिया , महसूस किया , फिर लिखा !

ग़म से कहीं नजत मिले चैन पायें हम,
दिल खून में नहाए तो गंगा नहायें हम !

सर दोस्तों के काट कर रखे हैं सामने
गैरों से पूछते हैं क़सम किसकी खाएं हम !!!!


दाग़ कमज़ोर थे ऐसा कहना सरासर बे-इमानी होगी ! दाग नादिर शाह का दिल्ली के गलियारों को लाशों से पाट देने के किस्से सुन -सुन के जवान हुए, दाग मुगलिया सल्तनत को ज़मींदोज़ होते देखते रहे, फाकाकशी में जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजार दिया लेकिन कोई उफ़ नहीं की और न ही कोई ऐसी आवाज़ आयी दाग़ के कलम से... लेकिन हादसा दिल के टूटने का हुआ ...बार-बार हुआ तो दाग़ बिलख पड़े !

लुत्फ़ वो इश्क में पाए हैं कि जी जानता है
रंज भी इतने उठाये हैं के जी जानता है !

जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने
तूने दिल इतने दुखाये हैं कि जी जानता है !!