
उर्दू जबाँ का इक अल्फाज़ ही है
' इश्क ' ! किसी ने इसे शोहरत और इज्ज़त से नवाजा तो किसी ने तमाम अल्फाजों में, तमाम मायूसी के साथ इसके 'साइड - इफेक्ट' गिना दिए ! गोया, हद तब हो गयी जब यही अल्फाज़ तमाम शायरों का पसंदीदा मसला बन गया , नौजवानों के लिए क्रेज़ बन गया और उनके माँ- बाप के लिए बवाल-ए-जान ! जान लेने - देने की नौबतें आने लगी ! हिसाब- किताब होने लगा ! दस्तावेज तैयार होने लगे !
पहले नाम आया कैश - लैला का तो पीछे पीछे हीर - राझा , सोनी - महिवाल कितने ही लोग आ गए ! फिर और कहानियां बनीं , कही और सुनी भी गयीं ! इश्क़ 'ट्रेंड' बन गया ! मजनू घर घर पैदा होने लगे ! वक़्त ने थोडी सी अंगडाई ली और फिर 'सक्सेस -रेट' का ग्राफ तेज़ी से गिरने लगा! और नाकामियों के हर्फों से मोहब्बत की इबारत लिखी जानी लगी ! और देखते ही देखते 'देवदास' नाम की इक नयी ज़मात पैदा हो गयी हँसते -खेलते इंसानों में !
साला ! ये इश्क़ का 'लोचा ' क्या है??
ग़ालिब ने ये सवाल शायद पर्सनली ने लिया , तपाक से बोले ,
" कहते हैं जिसे इश्क़ खलल है दिमाग का ' !
बस ! सारे अलसाये - सकुचाये कलम-बाजों को मसाला मिल गया ! दिल खोल के लिखा...
अब क्या क्या लिखा उसे उन्ही की इबारत में टुकडों- टुकडों में पढेंगे .. मीर, दाग़, फ़राज़, फैज़, मोमिन, ग़ालिब, फाकिर सब के अंदाज़ -ओ-बयाँ से रू-ब-रू करवाने की कोशिश रहेगी !!
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रोने - धोने में जिन्दगी जिन्हें बर्बाद करनी हो वो इश्क के पास जाए ..
'मीर' ने शायद इश्क का रुपहला रूप देखा ही नहीं था ! मीर की शायरी में 'consistency' दिखाई देती है ! मीर साहब के लिए इश्क का मतलब था दिल की बीमारी ... वो भी इक जानलेवा बीमारी ....
उल्टी हो गयी सब तदबीरें , कुछ न दवा ने काम किया
देखा, इस बीमारी -ए-दिल ने आखिर काम तमाम किया
अहद जवानी रो - रो काटी, पीरी में ली आँखे मूँद,
यानी रात बहुत थे जागे, सुबह हुयी आराम किया !!! आराम फरमाते 'मीर' का जो कोई हाल लेने पहुँचा तो दर्द की गिरफ्त में कराहते दिल का फरमान सुनाई दिया
" सिरहाने मीर के आहिस्ता बोलो, अभी टुक रोते रोते सो गया है !आप पढेंगे तो मालूम चलेगा की वाकई मीर को इश्क ने बहुत रुलाया है और मजे की बात ये है की मीर इसे बखूबी कुबूल भी करते हैं ... !!!
या रोये या रुलाये , अपनी तो यूँ ही गुज़री , ! मीर से जब भी पूछा की इश्क क्या है ज़वाब वही आया :-
क्या कहूं तुम से मैं कि क्या है इश्क,
जान का रोग है, बला है इश्क ! इतनी सारी खामियाँ दिखाने के बावजूद मीर मज़े से पूछते हैं कि
'क्या कहीं तुम ने भी किया है इश्क 
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ग़ज़ल को ज़बान देने की बात हो ,रंगीनियत के किस्से हो और
'दाग' साहब का ज़िक्र न हो तो बेमानी होगी ! दाग की रंगीनियत इक पहेली है ! मैंने दाग की जिन्दगी के कुछ पन्ने पढे हैं और उनके कुछ कलाम भी ! मैं सोच के हैरान हो जाता हूँ कि तन्हाई में तड़पता -बिलखता 'दाग़ देहलवी' किस खूबी से खुद को चुप कर लेता है और उसी खूबी से अगले ही पल रंगीन मिजाज़ 'नवाब मिर्जा खान दाग' बन जाता है ! दाग़ का 'इश्क' कभी गिले -शिकवे के गलियारों में घूमा तो कभी मुह-फट आवारा बन गया !
तू है हरजाई तो अपना भी यही तौर सही
तू नहीं और सही , और नहीं , और सही इश्क आरजू और इबादत बन बैठा दाग़ के लिए (
" ...आरजू है वफ़ा करे कोई !!), जब हकीकत से रू-ब-रू होने की घड़ी आयी तो दाग़ जैसा आदमी भी छटपटा उठा !
("... क्या मिला हम को जिन्दगी के सिवाय ..वो भी नातमाम , दुश्वार और खराब !! )जिस 'दिमागी खलल' की बात ग़ालिब ने की थी, जिस 'बीमारी-ए-दिल' का ज़िक्र मीर ने किया था वो दाग़ में दिखाई दी ! मीर-ग़ालिब ने जो अल्फाज़ दिए उन्हें दाग़ ने जिया , महसूस किया , फिर लिखा !
ग़म से कहीं नजत मिले चैन पायें हम,
दिल खून में नहाए तो गंगा नहायें हम !
सर दोस्तों के काट कर रखे हैं सामने
गैरों से पूछते हैं क़सम किसकी खाएं हम !!!!दाग़ कमज़ोर थे ऐसा कहना सरासर बे-इमानी होगी ! दाग नादिर शाह का दिल्ली के गलियारों को लाशों से पाट देने के किस्से सुन -सुन के जवान हुए, दाग मुगलिया सल्तनत को ज़मींदोज़ होते देखते रहे, फाकाकशी में जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजार दिया लेकिन कोई उफ़ नहीं की और न ही कोई ऐसी आवाज़ आयी दाग़ के कलम से... लेकिन हादसा दिल के टूटने का हुआ ...बार-बार हुआ तो दाग़ बिलख पड़े !
लुत्फ़ वो इश्क में पाए हैं कि जी जानता है
रंज भी इतने उठाये हैं के जी जानता है !
जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने
तूने दिल इतने दुखाये हैं कि जी जानता है !!